We had promised to the people of Bhargain that we will return to them in July / August so that all those who could not avail the benefits of the first health camp are able to do so in the second. It is always easy to promise but very difficult to keep.
We visited Bhargain on 23 June to put things in perspective for the camp to be held on 25th of July. The team visited the tentative sites and zeroed in on two places, namely the Barat Ghar and the School. This would entail two teams for two different venues. Although all of us are not very comfortable with the idea of this split, we have to do it keeping in view the local demand and socio-political compulsions.
The team was as usual hosted by Aslam Bhai in company of our friend Chhiddan Khan. We were also lucky to be witness to a cricket tournament going on in the town. The ground was bad but then players rarely get discouraged by such limitations. We as a team dream better sports facilities for the people of Bhargain in future. May God fulfill these dreams. We are thankful to Aslam Bhai for introducing us to Chunna Bhai who has extended all co-operation for the ensuing camp.
कुछ दिनों पहले ही झाऊ झोर गाँव में एक डकैती पडी और उसमें एक व्यक्ति की जान भी चली गयी। हम लोग वहां गए, और दर्द को बांटने की कोशिश की। सभी की आँखें नम हो गयीं। छिद्दन भाई की पहल पर पीड़ित परिवार को बहुत छोटी मदद हम पहुंचा आये हैं लेकिन उसका सही लाभ तभी होगा जब हम उन बच्चों की शिक्षा अच्छी तरह करा सकें जिनके सर पर पिता का साया नहीं रहा।
सैफू ने जिस उर्स का ज़िक्र किया उसमें भी हम शामिल हुए। हजारों की तादाद में लोगों ने उस शाम का लुत्फ़ उठाया और जैसा कि साजिद भाई ने बताया प्रोग्राम सुबह ७ बजे तक चला। लेकिन सभी ने ये महसूस किया कि वो बात नहीं थी जो युसूफ मलिक साबरी में थी।
और फिर रात में ही सभी अपने अपने ठिकानों को रवाना हो गए। इस बार हमारे सहयात्री बने पीयूष कान्त खरे जो कि Sainik School Lucknow ke alumnus हैं और नौसेना में कार्य रत हैं। Welcome to the tribe Peeyush.
Others who were part of the Journey: Mohd Arif, Sakhawat Husain , Mohd। Shahid, Mohit Gupta, Anuj Saxena, Sudhir Tyagi and Dharmendra Sachan.
Team Anubhuti
Sunday, June 27, 2010
Tuesday, June 22, 2010
पटियाली में एक और रंगीन शाम...
हरवेन शाह दरगाह की ज़ोरदार शाम के बाद इस बार फिर एक शाम रंगीन होने जा रही है जिसमें कलाकारों के फन का रातभर बखूबी लुत्फ उठाया जाएगा।
ये शाम हज़रत बदरुदीन शाह रहमतुल्ला अलेह के नाम से मनायी जाएगी जिसमें पटियाली के लोगों की भरपूर शिरकत का अनुमान है। इस रात को हम हज़रत बदरुदीन शाह के नाम करते हुए कव्वाली और शेरो-शायरी का एक एसा मंच रच रहे हैं जिसमें रात की चांदनी भी हसते-हसते हमें खुद के साथ जागने का न्यौता दे और उगता सूरज भी एक पल के लिए सोचे की सुबह की रोशनी कही इस रंगीनियत को खा ना जाए।
रात का अंधेरा हमे खुद के साथ शांत कर लेता है और उस शान्ति को हम अपनी रोज़मर्रा में उतार लेते है यही जीवन का क्रम है।
फिर एक बार रात को सोने वाली आँखें रात के अधेरे में भी रास्तों से गुज़रती हुई हज़रत बदरुदीन शाह की दरगाह पर मजमा लगाएंगी। और एक खूबसूरत माहौल बनाया जाएगा जिसमें उतरने वाला हर शख़्स खुद के मज़े की तलाश में घूमता दिखाई देगा।
क्या खूब कहा है कहने वालों ने
हम अंजान रहे यही के रहने वालों में
वो बनाते गए हर एक रात को रंगीन
और हम गिने गए रात को सोने वालों में।
Anubhuti team
ये शाम हज़रत बदरुदीन शाह रहमतुल्ला अलेह के नाम से मनायी जाएगी जिसमें पटियाली के लोगों की भरपूर शिरकत का अनुमान है। इस रात को हम हज़रत बदरुदीन शाह के नाम करते हुए कव्वाली और शेरो-शायरी का एक एसा मंच रच रहे हैं जिसमें रात की चांदनी भी हसते-हसते हमें खुद के साथ जागने का न्यौता दे और उगता सूरज भी एक पल के लिए सोचे की सुबह की रोशनी कही इस रंगीनियत को खा ना जाए।
रात का अंधेरा हमे खुद के साथ शांत कर लेता है और उस शान्ति को हम अपनी रोज़मर्रा में उतार लेते है यही जीवन का क्रम है।
फिर एक बार रात को सोने वाली आँखें रात के अधेरे में भी रास्तों से गुज़रती हुई हज़रत बदरुदीन शाह की दरगाह पर मजमा लगाएंगी। और एक खूबसूरत माहौल बनाया जाएगा जिसमें उतरने वाला हर शख़्स खुद के मज़े की तलाश में घूमता दिखाई देगा।
क्या खूब कहा है कहने वालों ने
हम अंजान रहे यही के रहने वालों में
वो बनाते गए हर एक रात को रंगीन
और हम गिने गए रात को सोने वालों में।
Anubhuti team
Sunday, June 06, 2010
Events Coming Up
One month Karate Camp
at
Ganjdundwara beginning
4th July 2010
Qawwali in
Urs at Patiyali
23rd June 2010
Artist
Tasleem Arif
Health Camp
at
Bhargain
25th July 2010
at
Ganjdundwara beginning
4th July 2010
Qawwali in
Urs at Patiyali
23rd June 2010
Artist
Tasleem Arif
Health Camp
at
Bhargain
25th July 2010
Friday, June 04, 2010
पटियाली में राहत...
सुबह की चुभती धूप के बाद ,दोपहर को दौड़ती-भागती हवाओं ने इशारा कर दिया था कि अब राहत बहुत दूर नहीं। लोगों की दुआओं और उम्मीदों को पूरा होने में अब वक्त कम ही लगेगा, हवाओं के साथ बातों का सिलसिला जो एक दूसरे तक बड़ी तेज़ी से चल पड़ा है। किसी को लगता है कि ये तेज़ चलती हवाएं सुकून लाएंगी तो किसी को पहले से ही मालूम है कि आज सिर्फ हल्का पानी पड़ेगा, जिससे कि भभका उठेगा।
शाम होते-होते कई घंटों के इंतज़ार के बाद तेज़ चलती हवाओं में लिपटी कुछ बारिश की बूंदों ने पटियाली में दस्तक दी। लोगों ने आहें भरीं और ऊपर नज़रें उठाकर सुकून की साँसें लीं लेकिन ये सुकून चंद लम्हों का ही था।
हवाओं में ठंडक थी इसलिए हर झोंका ये फुसफुसाता लगता कि "आज बारिश होगी"। सुबह से मौसम कहना चाह रहा है कि चप्पलें पहन लो और घर निकल लो। वरना कहीं ये न हो कि पानी पड़े और तुम छींकें मारते घूमो ।
सड़कों पर चलती हर गाड़ी (जीप) ने अपने सिर पर तिरपाल का अंगोछा ओढ़ लिया है। उम्मीद के साथ बनी हर तस्वीर पर छीटों का पड़ना जरूरी लगने लगा है जिससे कि उस तस्वीर की शक्ल भी भीगी -भीगी सी लगे।
रात का अंधेरा छाते ही तेज़ हवाओं के साथ फिर ऐसा लगा जैसे कोई सोते हुए को जगाने के लिए पानी की छींटें मारता है जैसे किसी प्यासे को कुछ बूंदों का सहारा दिया जाता है, जिससे कि जान में जान बनी रहे। लेकिन यहां का आलम चाहता है कि बारिश खूब जम कर हो, लोगों को हर तरीके से राहत मिले- खेती भी अच्छी हो और काम करने में बदन भी न टूटे। पटियाली में बारिश के साथ-साथ पेड़ों पर लगे आमों की भी बारिश हो जाएगी क्योंकि अब आम पुर चुका है बस अब वो पानी मांग रहा है पकने के लिए।
खुदा की नेमत का इंतज़ार तो हर किसी को है।
किसी को मिला पानी, तो धूप किसी को है।
Anubhuti Team
Monday, May 31, 2010
और पूजा अपने घर चली गयी
जिन्होंने "शेखर एक जीवनी " पढ़ा है वे सरस्वती के सन्दर्भ में इन शब्दों के मायने बखूबी समझ सकते हैं। बेटी की विदा के समय परिवार की मानसिक स्थिति का अंदाजा तो वैसे भी हर हिन्दुस्तानी जानता ही है। पूजा के घर वालों के लिए तो ये पल खास तौर से और भी कष्टप्रद थे क्योंकि उन्होंने बहुत विषम परिस्थितियों में पूजा को विदा किया।
उन्हें तो ये विश्वास भी न रहा था कि तय दिन पूजा की शादी हो पायेगी। नगला चिना में हुए अग्निकांड में सब कुछ खो चुके वीर सहाय शाक्य को चिंता सता रही थी कि आखिर उनकी बेटी की शादी धनाभाव में कैसे होगी। लेकिन अनुभूति का संकल्प रंग लाया और पूजा की शादी धूम धाम से संपन्न हो गयी।
शुक्रिया उन तमाम लोगों का जिन्होंने इसे संभव बनाया। खास तौर से जनाब लक्ष्मी नारायण यादव जी का, भाई इमरान , वाहिद भाई , हामिद भाई, आमिर भाई , सलीम भाई और मलिक मोहम्मद साजिद का जिन्होंने तन मन धन से सहयोग किया।
"अनुभूति के लोग " आगे भी इसी जज्बे से काम करेंगे यही टीम की उम्मीद है। हम सब सामान्य लोग हैं लेकिन हमारे आदर्श ऊंचे हैं। The lines below indicate the spirit with which Anubhuti is working :
I have learnt to give Not because I have too much
but
Because I know the feeling of not having .
उन्हें तो ये विश्वास भी न रहा था कि तय दिन पूजा की शादी हो पायेगी। नगला चिना में हुए अग्निकांड में सब कुछ खो चुके वीर सहाय शाक्य को चिंता सता रही थी कि आखिर उनकी बेटी की शादी धनाभाव में कैसे होगी। लेकिन अनुभूति का संकल्प रंग लाया और पूजा की शादी धूम धाम से संपन्न हो गयी।
शुक्रिया उन तमाम लोगों का जिन्होंने इसे संभव बनाया। खास तौर से जनाब लक्ष्मी नारायण यादव जी का, भाई इमरान , वाहिद भाई , हामिद भाई, आमिर भाई , सलीम भाई और मलिक मोहम्मद साजिद का जिन्होंने तन मन धन से सहयोग किया।
"अनुभूति के लोग " आगे भी इसी जज्बे से काम करेंगे यही टीम की उम्मीद है। हम सब सामान्य लोग हैं लेकिन हमारे आदर्श ऊंचे हैं। The lines below indicate the spirit with which Anubhuti is working :
I have learnt to give Not because I have too much
but
Because I know the feeling of not having .
Saturday, May 29, 2010
माहौल और आकार के बीच का चिठ्ठा....
अनजाने सवालों और हल्की मुस्कराहट के साथ मिलते, अपना परिचय और आपका परिचय मांगते लोग. कहा-सुनी के बाद इस सफ़र को उस पहलू से देखना शुरू कर देते जिस सफ़र की नीव रख दी गई है उस परिचय के साथ ।
पटियाली तहसील जिसके साथ कई नई उम्मीदें , सपने और बुनाई की गांठें लगाने को तैयार हम, जगह के बनने के साथ-साथ कई नई जिंदगियों को रचने की कल्पना कर रहे हैं । पटियाली तहसील को कल्पना और रचनात्मकता की नज़र से देखने की उत्सुकता से एक ख़ास जगह को बनाने की शुरुआत कर दी गई है- वो ख़ास जगह खुद की खासियत के उभार से लोगों तक पहुच सके और रचने-जड़ने का एक नया माहौल तैयार कर सके।
सुनने-सुनाने का मज़ा और खुद को निरंतर बहाव में रखने का लुत्फ़ ही रोज़मर्रा को एक सीधी दिशा दे सकता है। ठीक नदी के पानी की तरह जिस को ये पता नहीं होता कि उसे कितने मोड़ होकर गुज़रना है, कितनों की छुअन से रूबरू होकर भी खुद को फिर भी शीतल जल ही कहना है, रुकने–ठहरने के बावजूद भी अपने बहाव को नहीं भूलना है, फिसलना, रास्ता बनाना, कई आकारों में ढल जाना और निरंतर रास्तों की ख़ोज में बने रहना है।
अनुभूति का कुछ अपनी और कुछ लोगों की सहमति से होकर गुज़रना लगातार चल रहा है लेकिन उत्साह की उमंग को जागरूक करना अभी बाकी है। अनुभूति टीम का जगह के साथ एक बे-जोड़ रिश्ता नज़र आता है लेकिन अब जिस प्रस्ताव के साथ अनुभूति टीम समाज के बीच उतर रही है उस सपने से पटियाली तहसील के कई यंग युवक-युवतियां (लड़के-लड़कियां) खुद से और समाज से भविष्य से और सपनों से एक ख़ास तरह की बहस, समझ और चीजों को परखने के लिए तैयार हो जायेंगे.
कहते है :-
सपनों में हो अगर दम तो,
उड़ने के लिए पंख भी कम लगते है,
बीत जाता है दिन, गुज़र जाती है शाम,
रात में फिर नए सपने बुनने लगते है।।
और उन सपनों को मूल रूप से एक पूर्ण ढांचे में उतरने की शुरुआत हो चुकी है।
anubhuti team.
पटियाली तहसील जिसके साथ कई नई उम्मीदें , सपने और बुनाई की गांठें लगाने को तैयार हम, जगह के बनने के साथ-साथ कई नई जिंदगियों को रचने की कल्पना कर रहे हैं । पटियाली तहसील को कल्पना और रचनात्मकता की नज़र से देखने की उत्सुकता से एक ख़ास जगह को बनाने की शुरुआत कर दी गई है- वो ख़ास जगह खुद की खासियत के उभार से लोगों तक पहुच सके और रचने-जड़ने का एक नया माहौल तैयार कर सके।
सुनने-सुनाने का मज़ा और खुद को निरंतर बहाव में रखने का लुत्फ़ ही रोज़मर्रा को एक सीधी दिशा दे सकता है। ठीक नदी के पानी की तरह जिस को ये पता नहीं होता कि उसे कितने मोड़ होकर गुज़रना है, कितनों की छुअन से रूबरू होकर भी खुद को फिर भी शीतल जल ही कहना है, रुकने–ठहरने के बावजूद भी अपने बहाव को नहीं भूलना है, फिसलना, रास्ता बनाना, कई आकारों में ढल जाना और निरंतर रास्तों की ख़ोज में बने रहना है।
अनुभूति का कुछ अपनी और कुछ लोगों की सहमति से होकर गुज़रना लगातार चल रहा है लेकिन उत्साह की उमंग को जागरूक करना अभी बाकी है। अनुभूति टीम का जगह के साथ एक बे-जोड़ रिश्ता नज़र आता है लेकिन अब जिस प्रस्ताव के साथ अनुभूति टीम समाज के बीच उतर रही है उस सपने से पटियाली तहसील के कई यंग युवक-युवतियां (लड़के-लड़कियां) खुद से और समाज से भविष्य से और सपनों से एक ख़ास तरह की बहस, समझ और चीजों को परखने के लिए तैयार हो जायेंगे.
कहते है :-
सपनों में हो अगर दम तो,
उड़ने के लिए पंख भी कम लगते है,
बीत जाता है दिन, गुज़र जाती है शाम,
रात में फिर नए सपने बुनने लगते है।।
और उन सपनों को मूल रूप से एक पूर्ण ढांचे में उतरने की शुरुआत हो चुकी है।
anubhuti team.
Monday, May 24, 2010
बहुत कठिन है डगर पनघट की
जब युसूफ मलिक साबरी साहब ने ये क़व्वाली गाना शुरू किया तो समां देखते ही बनता था। अमीर खुसरो की ज़मीन उनके ही कलाम से महक रही थी। हजारों लोग, बच्चे ,बूढ़े , युवा और महिलाएं जैसे कि सम्मोहित हो गए हों। वक़्त जैसे थम गया हो। कोई अपनी जगह से हिलता तक न था। और ये सुबह के चार बजे तक चलता रहा। युसूफ भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया कि आप हमारे दावतनामे पर तशरीफ़ लाये और आपके फ़न की हम क्या तारीफ़ करें?
हर गोशा गुलिस्ताँ था ,कल रात जहाँ तू था
एक जश्ने बहारां था, कल रात जहाँ तू था।।
नगमे थे हवाओं में, जादू था फिजाओं में
हर सांस ग़ज़लफाँ था ,कल रात जहां तू था ।।
And that is how We celebrated the diversity that is India in the land of Hazrat Amir khusro.
लेकिन इस उत्सव के पहले हमने बहुत सा दर्द देखा, आंसू देखे और जले हुए मकान देखे। चाहे वो सिंकदरपुर हो , ल्यौडीया हो या नगला चिना हो हर तरफ जले हुए घर दर्द की दास्ताँ बयां कर रहे थे। अनुभूति की टीम ने हमेशा की तरह immediate relief के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई।
लेकिन एक घर था जहाँ आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। नगला चिना में वीर सहाय शाक्य की बेटी पूजा की शादी 27 को होना थी और सब कुछ जल कर खाक हो गया। संसाधनों के अभाव से दो चार अनुभूति करे भी तो क्या? लेकिन जहाँ चाह वहाँ राह। टीम ने संकल्प लिया कि बेटी की शादी होगी उसी धूम धाम से और उसी दिन जिस दिन तय है। उस लौटी हुयी मुस्कराहट की कोई कीमत नहीं और उस पर होने वाला खर्च कितना भी हो बड़ा नहीं।
शायद ऐसे ही जज्बे की वजह से हमें हर तरफ से सहयोग भी तो असीमित मिल रहा है। असलम भाई बरेली से चल कर आये और हमें फिर भरगेंन ले कर पहुंचे। वहां उन्होंने अनुभूति के लिए अपने घर को इस्तेमाल करने की पेशकश की । साथ ही सैफुद्दीन के काम के लिए भी फ़ौरन जगह की व्यवस्था भी कर दी। सैफू किसी तार्रुफ़ के मोहताज नहीं अब ये blog अधिकतर समय उन्हीं के हवाले रहेगा और वो खुद अपनी style में आपसे मुखातिब होंगे। Thanx Prabhat Bhai for this great contribution.
श्याम भाई सिढपुरा में अनुभूति के ऑफिस का निर्माण कार्य देख रहे हैं और सैफू के रहने की भी ज़िम्मेदारी आपने ली है। Thanx a lot.
And the camp at Majhaula turned out to be a success not because of us but because of the efforts of the new team members like Praveen of Dariyawganj, Harnath Singh ji of Majhaula and many others. Imran has offered his vehicle for local movement of goods, and also a room for Saifu in Patiyali for his interaction with aspiring writers.
There have been contributions for Anubhuti from great people in great amounts but one that needs to be recorded here is that of Shri Laxmi Narayan Yadav of Patiyali. At the age of 85 he is so impressed with Anubhuti's work that he has promised to contribute Rs 100 per month for all times to come. It was really a touching moment when he handed over those first 100 rupees.
Those who have read the last lines in the brochure would now appreciate the import of those words "struggle is eternal, the tribe increases, somebody else carries on." Alok Gupta is the latest entry and we hope he enjoyed the experience.
And quoting from Manoj Bhai's blog there are quite a few "Unspoken, Unwritten,and Unsaid" words of gratitude for Prabhat Bhai, Shahid, Sajid Malik, Anuj Saxena, Mohit Gupta, Dharmendra sachan, Sudhir Tyagi, Rajesh Dixit ,Bhaskar Sharma and Sajan Dev for being an integral and beautiful part of this long journey traversing which at many times makes you say "बहुत कठिन है डगर पनघट की"
Anubhuti Team
हर गोशा गुलिस्ताँ था ,कल रात जहाँ तू था
एक जश्ने बहारां था, कल रात जहाँ तू था।।
नगमे थे हवाओं में, जादू था फिजाओं में
हर सांस ग़ज़लफाँ था ,कल रात जहां तू था ।।
And that is how We celebrated the diversity that is India in the land of Hazrat Amir khusro.
लेकिन इस उत्सव के पहले हमने बहुत सा दर्द देखा, आंसू देखे और जले हुए मकान देखे। चाहे वो सिंकदरपुर हो , ल्यौडीया हो या नगला चिना हो हर तरफ जले हुए घर दर्द की दास्ताँ बयां कर रहे थे। अनुभूति की टीम ने हमेशा की तरह immediate relief के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई।
लेकिन एक घर था जहाँ आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। नगला चिना में वीर सहाय शाक्य की बेटी पूजा की शादी 27 को होना थी और सब कुछ जल कर खाक हो गया। संसाधनों के अभाव से दो चार अनुभूति करे भी तो क्या? लेकिन जहाँ चाह वहाँ राह। टीम ने संकल्प लिया कि बेटी की शादी होगी उसी धूम धाम से और उसी दिन जिस दिन तय है। उस लौटी हुयी मुस्कराहट की कोई कीमत नहीं और उस पर होने वाला खर्च कितना भी हो बड़ा नहीं।
शायद ऐसे ही जज्बे की वजह से हमें हर तरफ से सहयोग भी तो असीमित मिल रहा है। असलम भाई बरेली से चल कर आये और हमें फिर भरगेंन ले कर पहुंचे। वहां उन्होंने अनुभूति के लिए अपने घर को इस्तेमाल करने की पेशकश की । साथ ही सैफुद्दीन के काम के लिए भी फ़ौरन जगह की व्यवस्था भी कर दी। सैफू किसी तार्रुफ़ के मोहताज नहीं अब ये blog अधिकतर समय उन्हीं के हवाले रहेगा और वो खुद अपनी style में आपसे मुखातिब होंगे। Thanx Prabhat Bhai for this great contribution.
श्याम भाई सिढपुरा में अनुभूति के ऑफिस का निर्माण कार्य देख रहे हैं और सैफू के रहने की भी ज़िम्मेदारी आपने ली है। Thanx a lot.
And the camp at Majhaula turned out to be a success not because of us but because of the efforts of the new team members like Praveen of Dariyawganj, Harnath Singh ji of Majhaula and many others. Imran has offered his vehicle for local movement of goods, and also a room for Saifu in Patiyali for his interaction with aspiring writers.
There have been contributions for Anubhuti from great people in great amounts but one that needs to be recorded here is that of Shri Laxmi Narayan Yadav of Patiyali. At the age of 85 he is so impressed with Anubhuti's work that he has promised to contribute Rs 100 per month for all times to come. It was really a touching moment when he handed over those first 100 rupees.
Those who have read the last lines in the brochure would now appreciate the import of those words "struggle is eternal, the tribe increases, somebody else carries on." Alok Gupta is the latest entry and we hope he enjoyed the experience.
And quoting from Manoj Bhai's blog there are quite a few "Unspoken, Unwritten,and Unsaid" words of gratitude for Prabhat Bhai, Shahid, Sajid Malik, Anuj Saxena, Mohit Gupta, Dharmendra sachan, Sudhir Tyagi, Rajesh Dixit ,Bhaskar Sharma and Sajan Dev for being an integral and beautiful part of this long journey traversing which at many times makes you say "बहुत कठिन है डगर पनघट की"
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